बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

सपने



सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|
पलकों में बंद किये सपने सुहाने,

सोई हूँ पापा के लग कर सिरहाने|

तारों को अपने मैं तकिये में टाँकू
चंदा की खिड़की से धरती पे झाँकू|
फूलों के झूलों पर झूलूँ मगन मैं,
और ऊपर जाऊँ कि छू-लूँ गगन मैं |
उड़ने की चाहत है, गिरने का डर भी,
पापा ने थामा है, फिर क्या फिकर जी |

परियों की रानी है मेरी सहेली,
बूझो तो जानू ये छोटी पहेली,
कौन है जिसे मम्मी शेरू पुकारे,
पापा कहे जानूँ, दीदी दुलारे |
गिलहरी जो दादा की, दादी की चिड़िया,
मामा की कुट्लू है, नानी की गुड़िया|

अब तक ना समझे तो क्या तुम सयाने,
अकल के हो कच्चे, बड़े हैं बहाने |
छेड़ो नहीं, जाओ अपने ठिकाने,
सोई हूँ पापा के लग के सिरहाने |

सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|

शुक्रवार, अगस्त 16, 2013

मेरी प्यारी नानी

मेरी नानी अमेरिका आ गई है। जून २४  को  हमलोग सब हवाई अड्डे   गये उनको लाने के लिए।  ग्यारह बजे हमलोग सब नानी के साथ घर पहुँच गये थे. जब हमलोग घर आगये थे उनको सोने  का मन था. हमलोग फट से  पूछे  टीवी पे क्या देक्ति है और टीवी लगा दियें।

वो आज कल सबसे पहाले उठ जाती है.  दोपहर मे वो किताब पढती है और रात मे टीवी देखती है.
वो प्यार का दर्द है, सरस्वतीचन्द्र , और झलक दिखला जा देखती  है. उन के लिए कम्पूटर पर एक अलग से खाता बना लिया है .
उसके पास एक दोस्त है हमारी परोस की नानी तो इसलिए उनका थोड़ा  सा मन लगता है. एक दिन वो अपने से खाना बनाई है सब के लिए.
अब तो तुम सब देख  सकते हो की मेरी नानी सबसे प्यारी नानी है !


मंगलवार, जनवरी 01, 2013

पोती का पत्र दादा-दादी के नाम

समीक्षा दादा को चिठ्ठी लिखने में वयस्त 
प्यारे दादा और दादी ,
आप दोनों को नये साल की बहुत बहुत बधाई .यहाँ पर हमसब ने भी नया साल एक दोस्त के घर मनाया .मैं और श्रेया बहुत खेले .
हमलोग आपको  बहुत याद करते हैं .श्रेया को आम चाहिये और मुझे अमरुद चाहिए .आप दोनों यहाँ कब आएँगे ?
मैं तुम दोनों को बहुत प्यार करती हूँ .
आपकी प्यारी पोती,
समीक्षा

पापा की तरफ से:

समीक्षा ने पहली बार हिन्दी में चिठ्ठी लिखी है.उनका हिन्दी ब्लॉग अब तक पापा लिखता रहा है। मुझे बहुत खुशी है कि आज समीक्षा ने हिन्दी में दादा-दादी को चिठ्ठी भी लिखी और उसको अपने ब्लॉग पर भी लिखा। वैसे तो ये 8 साल की हैं लेकिन हिन्दी सीखते अभी 4 महीनें ही हुए हैं .
हाथ की लिखाई में अभी बहुत अभ्यास चाहिए लेकिन प्रारम्भिक लेख के लिए जितना आज लिखा है वो कम नहीं है। आप लोग अपनी टिप्पणियों से इन्हें प्रोत्साहित करते रहें .


शनिवार, दिसंबर 15, 2012

बचपन के पल


 
 
 
 
 
 
 
 
 


गुड़िया जैसी प्यारी हूँ मैं, इधर-उधर मंडराऊँ मैं ।

कभी चढ़ूँ पापा की गोदी, कभी छिटक इतराऊँ मैं। 
 

बड़ी-बड़ी आँखों से अपनी, देखूँ सब कुछ अचरज से।

घर देख लिया सारा लेकिन, जो चाहूँ वो न पाऊँ मैं।
 

कितने सारे लोग यहाँ हैं, कितना हल्ला-शोर यहाँ,

इस आपा-धापी भगदड़ से बच कोने में छुप जाऊँ मैं । 
 

इस कोने में आ कर के, कुछ खेल दिखा मेरे मन का,

इस कुत्ते को पुचकारूँ या टेबुल पर चढ़ जाऊँ मैं।
 

इन आँखों में सपने कितने, चेहरे पर भोलापन कितना,

बचपन के पल ना लौटेंगे, इनको जी भर जी जाऊँ मैं |

आभार:
दीवाली की  पार्टी में लोगों से छुपती-फिरती काइरा से प्रेरित।काइरा हमारे मित्र कपिल और शालू गुलाटी जी की डेढ़ साल की बेटी है।