गुरुवार, जुलाई 12, 2007

मेरी पहली भारत यात्रा ( की तयारी )

सोमवार की सुबह तक (११ -जून) मुझे पता ही नहीं था कि इन्डिया जाना क्या होता है| पापा-मम्मी पिछले कुछ दिनों से लगातार व्यस्त चल रहे थे | ख़ूब प्लानिंग भी चल रही थी | पूरे घर मे सामान बिखरा हुआ , अटैचीयां खुली हुई| मेरे लिए तो अच्छा था , खेलने के लिए नए और अजीबो-गरीब खिलौने थे | मम्मी के कपड़े, सारियाँ , गहने , नया मोबाईल फ़ोन -हर चीज़ मुझे जैसे बुला रही हो, " आओ , मुझसे खेलो" |
लेकिन जैसा कि हमेशा होता है, मेरी माँ मुझे कभी भी मेरे पसंद वाले खिलोने से खेलने नहीं देती | कभी भी कुछ उठाया तो - Sami ! डोंट टच ( Sami Dont Touch!! ) की गुहार लगाने लगती हैं | अब उन्हें कैसे समझाया जाये कि बिना छुए हुये मैं कैसे खेल सकती हूँ खिलौनों से |
नए कैमरे की फोटो - सारे फ़साद की जड़

अगर आपने मोबाइल -कैमरे से मेरी तस्वीर खींची है तो मेरा पुरा हक बनता है कि मैं देखूं कि फोटो कैसी आयी है | अलबत्ता , मुझे कैमरा(फोन) हाथ मे लेकर ही अपनी फोटो देखना पसंद है | अब यदि आपको फोन के गिर कर टूटने का डर है तो वो आपकी समस्या है | उसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ |
सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे तब आया जब ममा ने अपना पुराना फोन मुझे बहलाने के लिए दे दिया| मैं छोटी हूँ पर नए और पुराने फोन का भेद समझती हूँ | वो तो ढंग से चल भी नहीं रहा था | ना कोई कैमरा , ना रंगीन स्क्रीन | मैंने साफ जता दिया कि मुझे फालतू फोन दे कर टरकाने की उनकी सारी कोशिशें नाकाम होंगीं |
( पापा अभी काम कर रहा है, फुर्सत मे उससे और लिखावाउंगी )
फोन का झगड़ा यूं हीं समाप्त नहीं हुआ | बस कुछ समय के लिए टल गया | शाम को पापा बाज़ार चले गए और ममा जल्दी -जल्दी बची खुची पैकिंग मे लग गयी |
मैंने सोंचा कि फोन से खेलने का यही सही मौका है | मैंने फिर से फोन की सारी चाभियों के साथ टीप-टाप शुरू कर दी | ख़ूब मज़ा आ रहा था | लेकिन जब आपकी शामत आनी होती है तो आपको ज़रा भी अंदेशा नहीं होता | न वक्त का , न ही आने वाले तूफ़ान का | मैं अपने फोन अन्वेषण मे मशगूल थी कि अचानक से पापा का फोन आ गया | फोन की घंटी बजते ही मामा जो कि अब तक मेरी कार्गुजरिओं से अनभिज्ञ थी जैसे नींद से जाग उठी |
जब बार -बार मांगने पर भी मैंने फोन नहीं दिया तो वो अपनी पुरी ताक़त से चिल्लाईं | इतनी जोर से कि फ़ोन की दूसरी तरफ सुनता पापा जैसा ८० किलो का इन्सान भी हिल गया |जाहिर है कि उस भयानक गर्जन के बाद बारिश होनी ही थी | मैं अन्दर से एकदम सहम गयी और जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया | कोइ अगर इतने जोर से डांटे तो बिचारा बच्चा आख़िर कर भी क्या कर सकता है रोने के सिवा |
एक नए खिलौने को देखने और उससे खेलने का कौतुहल किस बच्चे मे न होगा | ये बात माँ -बाप जानते हुये भी अनसुना कर देते हैं | खैर मेरे अविराम रुदन से ममा का भी जी भर आया | उन्होने भी मेरे साथ रोना शुरू कर दिया | हम -दोनो ने एक -दूसरे को सॉरी कहा और उसके बाद जाकर ये विस्फोटक स्थति थोडी सामान्य हुई |
मेरा सिसकना तब भी जारी था जो कि ममा को लगातार अपराध-बोध करा रहा था | पापा के आने से पहले ही बिना -खाए पिए मैं सिसकते-सिसकते सो गयी |
एक खेल -कूद और रोमांच से भरा दिन सिसकियों पर खत्म हुआ |

( अगले दिन सुबह -सुबह मुझे दिल्ली की फ्लाईट पकड़नी थी ममा के साथ | भारत दौरे के बारे मे जल्द ही )

3 टिप्‍पणियां:

Vijendra S. Vij ने कहा…

वाह...बहुत सुन्दर इगा.बहुत अच्छा लिखा आपने..आगे भी लिखती रहो हमारी शुभकामनाये.

Ashok ने कहा…

लाजवाब ...इगा ! तहरा बरे में जन के बहुत खुसी भेल . अब तू हिन्दी ..के . मई ...भोजपुरी भी सीख ला . तहर पापा त भोजपुरी के एक्सपर्ट बारन

Ashok ने कहा…

लाजवाब ...इगा ! तहरा बारे में जान के बहुत खुसी भइल . अब तू हिन्दी ..के . माई ...भोजपुरी भी सीख ला . तहार पापा त भोजपुरी के एक्सपर्ट बारन