गुरुवार, जुलाई 12, 2007

तोहफ़े लेने की बारी अब मेरी


अभी -कुछ दिन पहले ही भारत से लौटी हूँ | तीन सप्ताह मे जितनी हिंदी और अक्लमंदी भारत से सीख कर आयी हूँ उतना तो पापा-ममी ३ सालों में नही सीखा पाए| वो कहावत -' खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे' , पूरी तरह से लागू हो रही है इन दोनो पर |

ममी कहती है कि मैं पुरी बदल चुकी हूँ महज २० दिनों में। उनकी बात ज़रा नहीं सुनती, बहुत ज्यादा बोलती हूँ और खाना खाने मे बहुत नखरे करती हूँ | मैं सिर्फ इतना ही कहूँगी कि आप दोनो कितने दिन तक एक मासूम बच्चे पर अपनी मनमानी चला सकते थे | एक दिन तो मुझे अक्ल आनी ही थी, सो आ गयी | भारत जाना और अक्ल का आना, मात्र एक बहाना , एक संयोग था |
पापा से अपना ब्लोग लिखवाने मे यही एक मुश्किल है | असली बात कहीं छूट जाती है , अनर्गल बातें होने लगती हैं | खैर अपनी भारत यात्रा के किस्से अगले ब्लोग मे लिखूँगी | कल की सबसे गरमा -गर्म खबर थी मेरा जन्मदिन | यानि कि मेरा तीसरा haappy birthday|
रात के साढ़े ग्यारह से ही कंप्यूटर पर मेरी और मोट्स मामा ( (Mots Mamaa) की गुफ़्तगू शुरू थी |
कुछ इस तरह से :
" अए ऽऽऽऽऽ मोट्स मामाऽऽऽऽऽ ?? "
" ए ऽऽऽऽऽ पग्लिया "
" पग्लिया बोला !!! हहाहाहा ... हंसी से लोट-पोट ....."
"अए ऽऽऽऽऽ मोट्स मामाऽऽऽऽऽ ??????? "
" ए ऽऽऽऽऽ पग्लिया "
" पग्लिया बोला !!! हहाहाहा ... हंसी का फिर से दौरा | "

और ये सिलसिला कुछ २०-२५ मिनटों तक चला |
उसी दौरान , पापा फ्रिज मे रखा केक ले आया , जिसको हमने १२ बजे के लगभग काटा | पापा-ममी , Mots मामा और मैंने खुद भी - happy birthday to you , happy birthday to you , वाला गाना गाया | फिर सबने थोडा थोडा केक खाया , Mots मामा को छोड़ कर |
वो कंप्यूटर पे था ना , कम्पूटर मे से निकल कर कैसे खाता |

मैं सोने से पहले " ए ऽऽऽऽऽ पग्लिया- ए ऽऽऽऽऽ पग्लिया " मंत्र जपती रही, हंसती रही | ममा की डांट के बाद ही चुप हुई |फिर हमलोग सो गए |

दिन- शाम की
कहानी जल्दी ही - यहीं पर |
नीचे कुछ झलकियाँ























































1 टिप्पणी:

उन्मुक्त ने कहा…

अहा जन्मदिन मुबारक। खूब पढ़ो, नाम कमाओ, खुश रहो।