शनिवार, दिसंबर 15, 2012

बचपन के पल


 
 
 
 
 
 
 
 
 


गुड़िया जैसी प्यारी हूँ मैं, इधर-उधर मंडराऊँ मैं ।

कभी चढ़ूँ पापा की गोदी, कभी छिटक इतराऊँ मैं। 
 

बड़ी-बड़ी आँखों से अपनी, देखूँ सब कुछ अचरज से।

घर देख लिया सारा लेकिन, जो चाहूँ वो न पाऊँ मैं।
 

कितने सारे लोग यहाँ हैं, कितना हल्ला-शोर यहाँ,

इस आपा-धापी भगदड़ से बच कोने में छुप जाऊँ मैं । 
 

इस कोने में आ कर के, कुछ खेल दिखा मेरे मन का,

इस कुत्ते को पुचकारूँ या टेबुल पर चढ़ जाऊँ मैं।
 

इन आँखों में सपने कितने, चेहरे पर भोलापन कितना,

बचपन के पल ना लौटेंगे, इनको जी भर जी जाऊँ मैं |

आभार:
दीवाली की  पार्टी में लोगों से छुपती-फिरती काइरा से प्रेरित।काइरा हमारे मित्र कपिल और शालू गुलाटी जी की डेढ़ साल की बेटी है।
 
 

गुरुवार, अप्रैल 05, 2012

नयी साझेदारी

बहुत दिन हुए आप सब से बात किये .

श्रेया -शैतानी आखों में है 
देखते -देखते मेरी छोटी बहन श्रेया ३ साल की हो गयी है . जो लोग मेरे अंगरेजी वाले ब्लॉग पर जाते रहते हैं उन्हें तो खबर है , लेकिन आप लोगों में से कुछ लोगों को पता नहीं है शायद. श्रेया अब उसी उम्र की है जब पापा ने मेरा पहला हिन्दी ब्लॉग लिखा . तो परंपरा के अनुसार उसका भी एक ब्लॉग तो बन ही जाना चाहिए.

अब मुश्किल ये है कि पापा से मेरा ब्लॉग तो संभलता नहीं , श्रेया  का नया ब्लॉग जब तक बनेगा  तब तक  वो कॉलेज  जाने लगेगी और अपना चिठ्ठा खुद लिखेगी . सो मैंने सोचा की क्यों न इसी चिठ्ठे में हम दोनों बहनें लिखा करें। (मेरा मतलब है की पापा से लिखवाया करें ).  क-ख-ग  सीखना शुरू किया था लेकिन अब सब भूल गयी .
इस बार गरमी छुट्टी  में जरूर सीख लूँगी. हम लोग वैसे भी साथ-साथ ही पापा -ममी को तंग करते हैं , तो जाहिर है  कि हमारी कहानियाँ एक जैसी ही होंगी.