शनिवार, दिसंबर 15, 2012

बचपन के पल


 
 
 
 
 
 
 
 
 


गुड़िया जैसी प्यारी हूँ मैं, इधर-उधर मंडराऊँ मैं ।

कभी चढ़ूँ पापा की गोदी, कभी छिटक इतराऊँ मैं। 
 

बड़ी-बड़ी आँखों से अपनी, देखूँ सब कुछ अचरज से।

घर देख लिया सारा लेकिन, जो चाहूँ वो न पाऊँ मैं।
 

कितने सारे लोग यहाँ हैं, कितना हल्ला-शोर यहाँ,

इस आपा-धापी भगदड़ से बच कोने में छुप जाऊँ मैं । 
 

इस कोने में आ कर के, कुछ खेल दिखा मेरे मन का,

इस कुत्ते को पुचकारूँ या टेबुल पर चढ़ जाऊँ मैं।
 

इन आँखों में सपने कितने, चेहरे पर भोलापन कितना,

बचपन के पल ना लौटेंगे, इनको जी भर जी जाऊँ मैं |

आभार:
दीवाली की  पार्टी में लोगों से छुपती-फिरती काइरा से प्रेरित।काइरा हमारे मित्र कपिल और शालू गुलाटी जी की डेढ़ साल की बेटी है।