बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

सपने



सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|
पलकों में बंद किये सपने सुहाने,

सोई हूँ पापा के लग कर सिरहाने|

तारों को अपने मैं तकिये में टाँकू
चंदा की खिड़की से धरती पे झाँकू|
फूलों के झूलों पर झूलूँ मगन मैं,
और ऊपर जाऊँ कि छू-लूँ गगन मैं |
उड़ने की चाहत है, गिरने का डर भी,
पापा ने थामा है, फिर क्या फिकर जी |

परियों की रानी है मेरी सहेली,
बूझो तो जानू ये छोटी पहेली,
कौन है जिसे मम्मी शेरू पुकारे,
पापा कहे जानूँ, दीदी दुलारे |
गिलहरी जो दादा की, दादी की चिड़िया,
मामा की कुट्लू है, नानी की गुड़िया|

अब तक ना समझे तो क्या तुम सयाने,
अकल के हो कच्चे, बड़े हैं बहाने |
छेड़ो नहीं, जाओ अपने ठिकाने,
सोई हूँ पापा के लग के सिरहाने |

सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (09-02-2016) को "नुक्कड़ अनाथ हो गया-अविनाश वाचस्पति को विनम्र श्रद्धांजलि" (चर्चा अंक-2247) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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चर्चा मंच परिवार की ओर से अविनाश वाचस्पति को भावभीनी श्रद्धांजलि।
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डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'