बुधवार, फ़रवरी 03, 2016

सपने



सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|
पलकों में बंद किये सपने सुहाने,

सोई हूँ पापा के लग कर सिरहाने|

तारों को अपने मैं तकिये में टाँकू
चंदा की खिड़की से धरती पे झाँकू|
फूलों के झूलों पर झूलूँ मगन मैं,
और ऊपर जाऊँ कि छू-लूँ गगन मैं |
उड़ने की चाहत है, गिरने का डर भी,
पापा ने थामा है, फिर क्या फिकर जी |

परियों की रानी है मेरी सहेली,
बूझो तो जानू ये छोटी पहेली,
कौन है जिसे मम्मी शेरू पुकारे,
पापा कहे जानूँ, दीदी दुलारे |
गिलहरी जो दादा की, दादी की चिड़िया,
मामा की कुट्लू है, नानी की गुड़िया|

अब तक ना समझे तो क्या तुम सयाने,
अकल के हो कच्चे, बड़े हैं बहाने |
छेड़ो नहीं, जाओ अपने ठिकाने,
सोई हूँ पापा के लग के सिरहाने |

सपनों की दुनिया है कितनी निराली,
हर रोज छुट्टी है, हर दिन दिवाली|